भारतीय संस्कृति के अनमोल रत्नों में से एक है दीपावली का झिलमिला पर्व। एक ऐसा पर्व, जो हर मन के क्यारी में खुशियों के दिपदिपाते फुल खिलता है। एक ऐसा पर्व जो हर अमीर-गरीब को अवसर देता है स्वंय को अभिव्यक्त करने का। यह त्यौहार ना सिर्फ सांकृतिक या पोराणिक रूप से बल्कि कलात्मक और सृजनात्मक रूप से भी मन की भावाभिव्यक्तियों के प्रभावित होने का अवसर देता है। हमारी संस्कृति का सुंदर संदेश है: अप्पो दीपो भव:। अपने दीप आप स्वंय बनें। स्वंय को स्वंय की चेतना से रोशन करें। खुद ही दीपक बन जाएँ खुद के लिए। यह देह माटी की है। माटी मिल जानी है। यह दीप भी माटी का है अंतर कहाँ रहा? आत्मा बाटी है बस प्रज्वलित करने का दायित्व निभाना है। हर उस बात को,उस रिश्ते को, उस नाम को मन-आँगन से हटा देना है जो पीड़ा देता है जो मन में कलुष का संचार करता है।